Tuesday, 15 November 2022

Real Relative or Reel Relative

 मित्रो, अभी कुछ दिनों पहले एक जगत का अनोखा ही रूप देखने को मिला।  या फिर यो  कहे की था तो पहले भी नजर में या सामने अब आया और पता चला की ये समाज इस कदर दिखावे या कहु के फॉर्मेलिटी में ग्रसित है के अपनापन का अहसास ही कही गुम सा हो गया है 

जैसे अगर अपने अनुभव से कहु  तो करीब करीब १० बरस पहले तक  एक व्यक्ति का दर्द सारा परिवार देखता व् सम्भालता था, उसका दर्द पूरा गांव बांटता था सब सुख दुःख में दिखावे के लिए नहीं पूरा अपनेपण  से खड़े होते थे साथ निभाते थे वो अब नजर ही नहीं आता |

ये मैआप लोगो को नेगेटिव करने के लिए नहीं कह रहा हु न ही मै कह रहा हु की अब कोई रिश्ते निभाता नहीं या सब स्वार्थी हो गए |       हमारे अपने वही है जो हमारे काम आये और साथ ही जिनके हम काम आये 😃

तो हुआ ये के मेरे एक रिस्तेदार बीमार पड़ गए।  उन्होंने लोगो से बताया नहीं पर किसी तरह ये बात उनके दूर पास के रिश्तेदारों को पता चल गई फिर क्या लगे आने कभी कोई दूर से कभी पास से, मै उनके बेटे के पास बैठा था तो *ये जान कर बड़ी ही ख़ुशी महसूस की के आज के जमाने में भी ऐसे रिश्ते नाते है जो इस तरह एक दूसरे के साथ दे रहे है।


उनके पुत्र से पता चला के इनमे से कई तो कई सालो से उनके परिवार से या उनके पिता जी से मिलने भी नहीं आये न ही फ़ोन वगेरा से संपर्क से है पर अब *देखा देखी* आ रहे है और हद तो इस बात की है हॉस्पिटल के नियम के हिसाब से जब सिक्योरिटी गार्ड मिलने नहीं देता तो उससे दो मिनट या ५ मिनट मरीज से मिलने के लिए रिश्वत या इल्तजाह कर रहे होते है। 

अगर हम सब इस सोशल मीडिया एप्लीकेशन्स जैसे व्हाट्सप्प, फेसबुक, इंस्टाग्राम से लिंक्ड रहे तो कितना अच्छा है।  सब की सब को खबर मिलते रहे सब इक दूसरे के सुख दुःख में शामिल हो।  

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*बजाय इसके के हम बन्दे को मिल न सके , बात कर न सके , माफ़ी मांग न सके , माफ़ कर न सके और सीथे उसके संस्कार या चौथे मै जगत दिखावी के लिए शामिल हो*



कुछ बुरा लगा हो तो माफ़ कीजियेगा । 






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Restriction or freedom... a thought

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